प्रकृति: रक्षति रक्षित:

हिन्दी शब्द पर्यावरण दो शब्दों -‘परि’ और ‘आवरण’ का जोड़ है। ‘परि’ का अर्थ हैं - ‘चारों तरफ’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ हैं - ‘घेरा’ अर्थात प्रकृति में जो भी चारों ओर दिखाई देता है या महसूस होता है जैसे- वायु, जल, मिट्टी , पेड़-पौधे तथा समस्त प्रकार के प्राणी ये सभी पर्यावरण के अंग हैं।

आक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक इनवायरमेंट का अर्थ है - आसपास की वस्तु स्थिति,परिस्थितियां अथवा प्रभाव। चेम्बर्स डिक्शनरी में इनवायरमेंट का अर्थ विकास या वृद्धि को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों से है। भारत के पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 2 (क) के अनुसार पर्यावरण में वायु, जल,भूमि, मानव तथा जीव-जन्तु, पौधे, सूक्ष्म जीवाणु और उनके बीच मौजूद अन्तर्सम्बन्ध सम्मिलित हैं।



धरती के अस्तित्व में आने के समय से ही पर्यावरण में परिवर्तन होता रहा है । ये दो तरह का होता है – जैविक और अजैविक लेकिन पिछली शताब्दी से लेकर अब तक पर्यावरणीय परिवर्तनों का मुख्य कारण मानवीय गतिविधियां रही हैं । जैव-विविधता की क्षति , भूमि के उपयोग में परिवर्तन , भूमि के हरित आवरण की कमी ,जंगलों की अधाधुंध कटाई ये कुछ ऐसी गतिविधियां हैं जिसके लिए सीधे तौर मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार हैं । मोटे तौर पर जंगलों की क्षति और कार्बन गैसों के उत्सर्जन को पर्यावरणीय परिवर्तनों का मूल कारण माना जाता है ।

यूं तो पर्यावरण में परिवर्तन उस वक्त भी जारी था जब मानव जाति अपनी आदिम अवस्था में ही थी फिर भी हमें ये मानना पड़ेगा कि पारिस्थितिकी में तेजी से परिवर्तन की सबसे बड़ी जिम्मेदार मानवीय गतिविधियां हैं । अगर भारत के संदर्भ में देखा जाए तो आजादी के काफी पहले से शुरु हुए रेलवे के विकास के साथ-साथ हमारी जैव-विविधताओं और जंगलों की क्षति की तेजी से शुरुआत हो गयी थी ।



रेलवे ट्रैक बिछाने के लिए भारी मात्रा में लकड़ियों का इस्तेमाल होता रहा जिसकी आपूर्ति शिवालिक हिमालय,मध्य भारत और दक्षिण भारत के जंगलों से की गई । इससे कई इलाकों में वृक्षों की कुछ प्रजातियों को बड़ा नुकसान पहुंचा नतीजतन इन इलाकों का पर्यावास बदला और उसके पीछे-पीछे कई वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया ।
 
हिमालय का शिवालिक इलाका सरीसृप और कीट-पतंगों की कई प्रजातियों के लिए उत्तम पर्यावास रहे हैं लेकिन विगत शताब्दी के दौरान जंगलों के हास के कारण इनमें से सरीसृपों की कई प्रजातियां लुप्त हो गईं । इसके अलावा 1960 के दशक से हम लगभग पूरे हिमालयन इलाके में सड़कों के लगातार होते विस्तार को देखते आ रहे हैं । इसे भी जंगलों के कटने और जैव-विविधता से भरे इलाकों को रहे नुकसान से जोड़ कर देखा जा सकता है । इस तरह से अब तक हिमालयन इलाके में हुई पारिस्थितिकी क्षति से उत्तराखंड भी अछूता नहीं रहा है । वृक्षों की गैर स्थानीय प्रजातियों के रोपण ने स्थानीय वृक्ष प्रजातियों को खासा नुकसान पहुंचाया है ।

 
आगे पढ़ें , इस लिंक में -


Comments ( 0 )

Leave a Comment