संकट में वन्य जीवन

वन्य जीवन के मामले में उत्तराखंड एक संपन्न राज्य है । ये उन वन्य प्रजातियों का पर्यावास है जिन्हें आमतौर पर खतरे में पड़ी प्रजातियां माना जाता है । इनमें बाघ,गुलदार,हाथी,काले और भूरे भालू जैसे प्राणी शामिल हैं । राज्य के लोगों के सामाजिक-आर्थिक जीवन ने कई वन्य प्रजातियों के अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। भूमि के लगातार बदलते प्रयोग , भूमि के हरित आवरण में आई कमी इसकी अहम वजहें रही हैं ।




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                                                         साल 2003 और 2008 के कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने स्पष्ट किया कि राज्य में बाघ,गुलदार,स्नो लैपर्ड,काले और भूरे भालू कस्तूरी मृगों की तादाद में पर्याप्त कमी आई है । साल 2003 के एक अध्ययन के अनुसार राज्य में बाघों की संख्या 245 थी जबकि गुलदार तकरीबन 2090 थे । साल 2002 में हाथियों की संख्या 1582 थी । साल 2001 का एक अध्ययन राज्य में चीतल की संख्य 35 हजार , कस्तूरी मृग की संख्या 160 और काले भालुओं की संख्या 375 होने का दावा पेश करता है । 



                                                          याक जैसे पशु तो राज्य में विलुप्त होने की कगार पर आ गये हैं । साल 2001 का एक वैज्ञानिक अध्ययन कृषि भूमि की बढ़ोतरी और चारागाहों की कमी का दावा करता है । साल 2008 का एक वैज्ञानिक अध्ययन कहता है कि निकट भूतकाल में राज्य के वन्यजीवन में कमी की प्रवृत्ति देखने में आयी है । हांलाकि वन्य प्राणियों के संरक्षण की विगत समय में की गई कोशिशों से इनके संरक्षण और संवर्धन में काफी मदद मिली है । राजाजी नेशनल पार्क और जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यानों ने इसमें काफी अच्छी भूमिका निभाई है । गुलदार और बाघ जैसे प्राणी इन उद्यानों के अलावा चमोली,रुद्रप्रयाग,टिहरी और पौड़ी गढ़वाल जैसे जिलों में भी पाये जाते हैं । काले भालुओं की प्रजाति शिवालिक इलाके में काफी तेजी से घटी हैं लेकिन चमोली जिले में इनकी तादाद में वृद्धि हुई है ।


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