योग और संगीत का संबंध

योग

योग कई अर्थों में प्रयुक्त होता है।इसका अर्थ है जोड़ या मिलन। "युजिर् धातु में "घ" प्रत्यय

मिलाने से यह बनता है। "युज्यते अनेन इति योगः"। जो मिला दे या जो जोड़ दे,वह क्रिया "योग"

है। शारीरिक और श्वास,प्रश्वास के संयमन की क्रियावों या व्यायामों को भी योग कहते हैं।कहीं

किसी विस्तृत विषय के प्रतिपादन में अलग अलग अध्यायों/खण्डों को भी योग कहा गया

है।गीता में सभी अध्याय एक एक योग कहे गये हैं। घटनावों के अनुकूल,प्रतिकूल होने को भी

सुयोग और कुयोग कहा जाता है;किन्तु जिस विशेष अर्थ में यह शब्द अब रूढ़ हो गया है,वह है

जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने की प्रक्रिया।



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ये प्रक्रियाएं कई प्रकार की हैं किन्तु उनमें 1- राजयोग 2- हठयोग 3- मंत्र या जपयोग 4-

भक्तियोग और 5- लययोग प्रमुख हैं। सब का लक्ष्य जीव का परमात्मा की सत्ता से निर्गुण या

सगुण रूप में एकाकार करना है। वह सदेह भी जीवन्मुक्त प्राणी बन,यंत्रवत् कर्म करते और

उनसे न बंधते हुए लोकहित रत हो सकता है।



 योग का प्रारम्भ आदि काल से ही है। भगवान कृष्ण ने गीता में इसका प्रवर्तक स्वयं को कहा है

। वे कहते हैं "हे अर्जुन! यह ज्ञान आदि में मैंने रवि को,रवि ने मनु को,मनु ने राजा इक्ष्वाकु को

बताया था,समय के प्रवाह में यह लुप्त हो गया,जिसे मैं फिर से तुम्हें बता रहा हूं।"(अध्याय

4,श्लोक 1से 3) हठयोग या कुण्डलिनी जागरण पद्धति के प्रवर्तक आदिनाथ यानी भगवान शंकर

हैं,जिन्होंने इसे माता पार्वती को बताया। श्रीकृष्ण "योगेश्वर" व भगवान शंकर "योगीश्वर"कहे

जाते है।अतःयह विद्या दिव्य है।
 

योग की चर्चा में महर्षि पतञ्जलि का नाम आना स्वाभाविक है।उन्होंने योग को चित्त की

वृत्तियों का निरोध"कहा है और इसके आठ अंग बताए हैं1-यम 2-नियम 3-आसन 4-प्राणायाम

5-प्रत्याहार 6-धारणा 7-ध्यान और 8-समाधि। इस विषय का विस्तार अनन्त है। सारांशतःजीव

ब्रह्मस्वरूप ही है,बस माया का परदा पड़ हुवा है।मन चञ्चल है और इन्द्रियों के विषयों में रत

होकर ऊर्जा नष्ट करता रहता है।शास्त्र वर्णित उपायों से,उसे विषयों से हटाकर ध्यान से एकाग्र

करें।यह ध्यान अविरल और निर्बाध होने पर समाधि की स्थिति आ जाती है।"आज्ञा"चक्र यानी

दोनों भृकुटियों के बीच के स्थान पर ध्यान लगाना श्रेयस्कर है।यहां ध्यान लगाने से साधक को

पहले जलते हुए दीपक का प्रकाश दिखाई पड़ता है,फिर बादल में छिपे सूर्य की लालिमा का

आभास होता है,तदनन्तर विशुद्ध चक्र से मूलाधार पृथ्वी तत्व तक प्रकाश का भान होने लगता

है। (ज्वलद्दीपाकारं तदनु च नवीनार्क बहुलः।प्रकाशं ज्योतिर्वा गगन धरणी मध्य मिलितम्।।)

इसी स्थिति को गीता में यों कहा गया है--"सर्व द्वारेषु कौन्तेय प्रकाश उपजायते "।
 
     

ध्यान करने के अन्य विन्दु या केन्द्र भी बताये गये हैं,जैसे नासिका का अग्र भाग,मानसिक रूप

से अंतःयात्रा, वास्तुकला,चित्रकला,वाद्य,गायन स्वर,आराध्य देव का कोई अंग विशेष

आदि;किन्तु आज्ञा चक्र में मन सूक्ष्म रूप से अपनी रश्मियों के साथ रहता है।अतः अधिक

फलदायी है।कहा गया है "एतद् पद्यान्तराले निवसति च मनःसूक्ष्म रूपं प्रसिद्धम्" मन से 64

रश्मियां प्रवाहित होती हैं।यहां ध्यान की अविरलता से साधक को उन्मनी गति और परम शिव

का दर्शन सुलभ हो जाता है।योग सिद्धि तभी है जब उन्मनी गति लब्ध हो जाय।"उन्मन्या

सहितो योगी न योगी उन्मनी बिना"। फक्कड़ साधु कबीरदास ने इसी को कहा है,"उन्मनि चढ़ा

मगन रस पीवै "।

         कैवल्य की स्थिति का वर्णन करते हुए आद्य-शंकराचार्य कहते हैं:--

          क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदं जगत्।

          अधुनैव मया दृष्टं नास्ति किं महदद्भुतम् ।।

                                        (विवेक चूड़ामणि)

(अहा!यह संसार कहां चला गया ? इसे कौन ले गया ? यह कहां लीन हो गया ? अहो!बड़ा

आश्चर्य है,जिस संसार को अभी मैं देख रहा था,वह कहीं दिखाई नहीं देता।)


हठयोग में कुण्डलिनी को जागृत कर विन्दु स्थान तक पहुंचाया जाता है। जप योग में मंत्र जप

से आराध्य से आमेलन होता है। जप तीन प्रकार का होता है--वैखरी,उपांशु,मानसिक।लय योग

साधना द्वारा परा सत्ता में लय होने अर्थात् सायुज्य मुक्ति का पथ है।भक्ति योग भजन

कीर्तन,श्रद्धा मिश्रित प्रेम से इष्ट का अनन्य चिन्तन का योग है।हठयोग का आधार तंत्र है अन्य

का वेद।


( शेष अगली किश्त में )


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