योग का संगीत से अटूट संबंध

संगीत
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        सुव्यवस्थित ध्वनि जो रस की सृष्टि करे "संगीत" कहलाती है। इसे प्रारम्भ में गायन,वादन और नृत्य समन्वित माना गया यथा -- "गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते।"; किन्तु बाद में प्रथम दो से ही इसकी पूर्ति मानी गई।संगीत भी आदि काल से ही है।इसका सम्बन्ध स्वर,लय ताल से है।नाद इसका मूल है।सृष्टि में जब कुछ नहीं था,तो सर्व प्रथम एक "स्फोट" हुवा,जिसका स्वर ॐ जैसा था,जो सारी वर्णमाला का मूल,शब्द ब्रह्म है।यह सर्वार्थ सिद्धि कारक है।सबसे पहले आकाश की सृष्टि हुई,जिसकी तन्मात्रा "शब्द" है।कहा गया है "नादाधीने जगत्"।स्वर मुख से तथा नाना वाद्य यंत्रो से भी होते हैं।वे टकराने से हुए स्वर हैं।आहत नाद हैं।एक अनाहत नाद भी है,जो योग से अंतस्थल में सुनाई देता है। ध्यानावस्थित योगी को प्रारम्भ में मेघ गर्जना का फिर भेरी का स्वर सुनाई देता है। 


             


सारी प्रकृति या सृष्टि लय,ताल पर सञ्चालित है,जैसे संगीत।संगीत की उत्पत्ति भी आदि और अलौकिक है।भगवान की श्वास से निःसृत वेदों में सर्वश्रेष्ठ "सामवेद"में संगीत का मूल है।

सामवेद की "गान संहिता" में ऋचावों का लयबद्ध रूप मिलता है।ऋचावों को गीति का रूप देने के लिये आठ कारक माने गये हैं:--1-विकार 2-विश्लेष 3-विकर्षण 4-विराम 5-अभ्यास 6-लोप 7-आगम 8-स्तोम । संगीत के दृश्य और अदृश्य प्रभावों के अनुसंधान में रत ऋषियों को ऐसी चमत्कारी शक्तियां,सिद्धियां और अध्यात्म का इतना विशाल क्षेत्र उपलब्ध हुवा कि उसके लिये पृथक से एक वेद संकलित किया जिसे सर्वश्रेष्ठ मानते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अपने को "वेदानां सामवेदोऽस्मि" कहा।
समस्त स्वर, लय, ताल,छन्द,गति,मंत्र,राग,नृत्य,मुद्रा,भाव आदि सामवेद से निकले हैं। नाद 22 श्रुतियों में विभक्त हैं।ये विशिष्ट ध्वनि तरंगें हैं,जो सप्त स्वरों में निबद्ध हैं:---
1-षडज-(सा)तीव्रा,कुमुद्धति,मन्दा,छन्दोवती।
2-ऋषभ-(रे)दयावती,रञ्जनी,रतिका।
3-गान्धार-(ग)रौद्री,क्रोधा।
4-मध्यम(म)बज्रिका,प्रसारिणी,प्रीति,मार्जनी।
5-पञ्चम-(प)क्षिति,रक्ता,सान्दीपिनी,अलायिनी।
6-धैवत(ध)मदन्ती,रोहिणी,रम्या।
7-निषाद(नि)उग्रा,क्षोभिण।

          संगीत से स्नायु तंत्र को आराम मिलता है,स्मृति ह्रास कम होता है,अच्छी निद्रा आती है,तनाव दूर होता है।वनस्पतियों की वृद्धि भी होती है।मन एकाग्र करने में सहायक होता है।







योग से सामीप्य
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           सामान्यतया संगीत श्रवणेन्द्रिय का विषय है और योग में इन्द्रियों को विषयों से हटाया जाता है। एकान्त की संस्तुति की जाती है;किन्तु यह मन को एकस्थ करने में सहायक भी होता है। योगी को साधना के मध्यवर्ती स्तरों में विभिन्न भांति की ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं। "हठयोग दीपिका" में लिखा है कि जिनको तत्वबोध न हो वे नादोपासना करें।"संगीत रत्नाकर"के अनुसार नाद ब्रह्म की उपासना से त्रिदेवों की प्राप्ति होती है।अग्निपुराण के अनुसार शब्द ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म तत्व को लब्ध कर लेता है।ऋग्वेद 8/33/10 में कहा गया है कि"हे शिष्य तुम अपने आत्मिक उत्थान की इच्छा से हमारे पास आये हो।मैं तुम्हें ईश्वर का उपदेश देता हूं। तुम उसे प्राप्त करने के लिये संगीत के साथ उसे पुकरोगे,तो वह तुम्हारी हृदय गुहा में प्रकट होकर स्नेह प्रदान करेगा।"
          गीता अध्याय 9 श्लोक 14 में कहा गया है:---
          सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़वृताः।
          नमस्यन्तश्च मां भक्या नित्ययुक्ता उपासते।।
(अर्थात् वे दृढ़ निश्चयवाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति का यत्न करते हुए और मुझको बार बार प्रणाम करते हुए,सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते है।



       भगवती के ध्यान के वर्णन में सप्त स्वरात्मक वीणावादन आया है।वीणा के सप्त स्वरों को सिद्ध करने से सारस्वत प्रवाह होता है।उपासक वीणावादन द्वारा भगवती के भजन से प्रभावित होकर उस शब्द माधुर्य से वृत्तियों का पुञ्ज एक निश्चित स्थान पर जम जाता है।"गीतज्ञो यदि गीतेन नाप्नोति परमं पदम्।शिवस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते।।यानी गीतों से शिव का सालोक्य अवश्य मिलता है।
        कई दशक पूर्व की बात है,लेखक शिव जी को प्रसन्न करने वाले छन्द लिख रहा था।लौकिक करणों से वह रचनाक्रम रुक गया।वाह!एक दिव्य संदेश मिला कि रचना क्रम रुकने से वे अप्रसन्न हैं।तत्काल पुनः प्रारम्भ किया।यथोचित समय बाद उनके "प्रसाद"का प्रमाण मिल गया।आज भी उस दिव्य संदेश की स्मृति पुलकित कर देती है।उन महादेव को भी हमारे स्तुति गान की दरकार है।
        खैर!गीत को ताल के साथ लाने से निर्विकल्प समाधि हो जाती है।ताल से ही लास्य होता है,लास्य से लय यानी तदाकार होना।"तालज्ञश्चा प्रयासेन मोक्षमार्गं निगच्छति।"
        संगीत से पत्थर पिघलाना,मेघों का आह्वान आदि अनेक चमत्कार लोक विख्यात हैं।बैजू बावरा,तानसेन की करिश्माई संगीत कला से कौन परिचित नहीं?स्वामी हरिदास ने अपने संगीत भजन से वृन्दावन के निधिवन में प्रत्यक्ष रासलीला देखी और दिखाई तथा बांके विहारी को प्रकट किया,जिनका श्रीविग्रह वहां स्वामी जी की संगीत शक्ति के मूर्तिमन्त प्रमाण के रूप मे विराजमान और पूजित है।
         संगीत का कोई आलेख श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि का उल्लेख किये बिना अपूर्ण रहेगा। वे "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्" यानी पूर्ण परात्पर ब्रह्म ही थे।गोप बालाएं अति उच्च सिद्ध आत्माएं थीं,जिन्हें केवल सगुण रूप भगवान का सानिध्य पाना शेष रह गया था। उनके वंशी ध्वनि करते ही उस आनन्द बीज "क्लीं" मिश्रित स्वर से ब्रज सुन्दरियां इतने वेग से दौड़तीं कि उनके कुण्डलों के हिलने से वायु के झोंके आ रहे थे; और इस गति से वे उनसे मिल जातीं। अर्थात् सदेह सायुज्य प्राप्त कर लेती। भागवत की "रास पञ्चाध्यायी" के श्लोक मुक्ति पथ के सोपान ही हैं।
     
               निशम्य गीतं तदनंगवर्द्धनं
                      ब्रजस्त्रियः कृष्णग्रहीत मानसाः।
               आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमा
                      स यत्र कान्तो जव लोल कुण्डलाः।
                      
( तीसरी व अंतिम किश्त समाप्त )

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