राम भरोसे हिन्दू होटल

"राम भरोसे हिन्दू होटल" का जुमला बहुत बार सुना जाता है। मैंने भी सुना। मेरे दिमाग में भी यह जुमला आया। मैंने जानने का प्रयास किया तो आँखें फ़टी की फ़टी रह गईं। जब मुझे पता चला कि यह जुमला 6अप्रैल 1919 को अपने देश के आयातित विदेशी विचारधारा के बुद्धि-पिशाचों ने शुरू किया था।


1857 की क्रांति में हमारी पराजय के बाद फिरंगियों ने एक कुचक्र रचा जिससे पुनः विद्रोह न हो सके और भारत मे राष्ट्रवाद का उदय न हो। यही वह समय था जब अपने देश की शिक्षा का विदेशीकरण किया गया और इस शिक्षा में यह ध्यान रखा गया कि रोजगार से जुड़ी चीजें न सिखाई जायँ।

मैकले मॉडल लाकर शिक्षा में यह व्यवस्था सुनिश्चित की गई कि हम रहन सहन से तो भारतीय रहें पर मानसिक तौर पर फिरंगी गुलाम ही रहें। इसी समय से हथियार के लिए लाइसेन्स का प्रावधान किया गया।हथियार रखने और चलाना सीखने की सख्त पाबन्दी थी।इतना ही नहीं छुआछूत को भी बढ़ावा दिया गया।सबसे ज्यादा इस अफवाह को फैलाया गया कि केवल क्षत्रिय ही युद्ध कला सीख सकते हैं।आज इस तरह की अफवाहों पर लोग भरोसा भी करने लगे हैं।इतिहास साक्षी है कि अपने देश में हर जाति के लड़ाके थे। यह इसलिए भी पुख्ता होता है कि क्षत्रियों को मल्ल युद्ध में पारंगत नट समाज के लोग किया करते थे और यादवों का अखाड़ा मशहूर रहा है।



देश में मैकले मॉडल शिक्षा व्यवस्था लागू थी।लेकिन बापू जैसे कुछ लोग विदेश से शिक्षा ग्रहण करने में कामयाब हो गए और करीब 50 साल बाद 1915-1920 के दौर में पुनः राष्ट्रीयता की भावना जागने लगी।

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कांग्रेस के बैनर तले आंदोलन जोर पकड़ने लगा और लोग सड़कों पर उतरने लगे।ऐसे में फिरंगी हुक्मरानों के दलाल फिरंगियों को आश्वस्त करने लगे कि हिंदुओं से कुछ नहीं हो पायेगा।यही बताने के लिए "राम भरोसे हिन्दू होटल" का जुमला उछाला गया क्योंकि आज़ादी के दीवाने बिना किसी स्थापित नेतृत्व  के सड़कों पर उतरने शुरू हो चुके थे।

          लोककाव्य "आल्हा-ऊदल" की निम्न पंक्तियां इस बात की गवाही दे रही हैं कि लड़ाके सभी जातियों में थे और सबने मिलकर आज़ादी की जंग लड़ी हैं और इसको अक्षुण्ण रखना भी हम सबकी जिम्मेदारी है।

      मदन गड़रिया धन्ना गूलर आगे बढ़े वीर सुलखान,
      रूपन बारी खुनखुन तेली इनके आगे बचे न प्रान।
      लला तमोली धुनवां तेली रन में कबहुं न मानी हर,
      भगे सिपाही गढ़ माडौ के अपनी छोड़-छोड़ तलवार।


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Comments ( 2 )

  • डॉ अशोक दीक्षित

    बांटो और राज करो कि नीति । राष्ट्रवाद का उदय न हो सके हिन्दू संगठित न रहने पाए । लेकिन आजादी के 70 साल बाद भी वही शिक्षा नीति और भेदभाव जारी दुःखद !

  • ashutosh shukla

    बिल्कुल सही फरमाया आपने अशोक सर । राज बदला लेकिन शासकों का रवैय्या नहीं ।

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