Sunday, September 15, 2019
योग और संगीत का आपस में क्या संबंध है ?
रघोत्तम शुक्ल
लेखक,साहित्यकार एवं पूर्व प्रशासनिक अधिकारी

                        
मानव तन
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मानव तन त्रि-स्तरीय और पञ्च कोषीय है। स्थूल,सूक्ष्म और कारण,ये तीन स्तर हैं शरीर के,जिनमे पांचकोष है : अन्नमय कोष,मनोमय कोष,प्राणमय कोष,विज्ञानमयकोष तथा आनन्दमय कोष।



                                                       स्थूल शरीर स्थूल पञ्चभूतों यानी पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश तथा वायु से निर्मित है। सूक्ष्म देह सूक्ष्म पञ्चभूतों,पांच ज्ञानेन्द्रियों (कान,त्वचा,नेत्र,नासिका,रसना),पांच कर्मेन्द्रियों (वाणी,हाथ,पैर,गुदा और उपस्थ) अंतःकरण चतुष्टय (मन,बुद्ध,चित्त,अहंकार),पञ्च प्राण(प्राण,अपान,व्यान,उदान,समान),अविद्या तथा काम और कर्म से बना है।

                                



                                                 पञ्चभूतों के होने से तत्परिणामी पांच प्रभाव या तन्मात्राएं (गंध,रस,रूप,शब्द,स्पर्श) भी होती हैं। कारण शरीर सत,रज,तम गुणों से युक्त है। इसी के अंदर परब्रह्म का अंश जीवात्मा अकर्ता होकर विद्यमान है,जो जीवन संचालित करता है।

                         शरीर में आठ चक्र हैं मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपूर,अनाहत,विशुद्ध,आज्ञा,नाद,विन्दु। इसमें तीन नाड़ियां --  इड़ा,पिंगला और सुषुम्ना हैं । सुषुम्ना के अंदर बज्रा और बज्रा के अंदर चित्रा नाड़ी है। चित्रा का मुख ब्रह्म नाड़ी है। मूलाधार चक्र यानी बैठने की जगह अंदर मेरुदण्ड के अंत पर "कुण्डलिनी" विराजमान है । यह साढ़े तीन फेरे लगाये सुषुप्त पड़ी रहती है। इस प्रकार यह शरीर जड़,चेतन,प्रकृति,पुरुष अथवा परा और अपरा प्रकृति का संगम कहा गया है।

                                            मृत्यु काल में जीवात्मा इसी सूक्ष्म शरीर (कारण शरीर सहित) को बाहर ले जाता है,और उदान वायु के सहारे परलोक गमन करता है। स्थूल देह यहीं रहकर अलग अलग विधियों से नष्ट हो जाता है।
  
                                            मनुष्य ने नाना शोधों और अभ्यासों से जीवन को सफल बनाने के उपाय निकाले हैं।लोक और परलोक सिद्ध करना,श्रेष्ठ बनाना मनुष्य की चिर अभीप्सा रही है। मैं कौन ? कहां से आया ? अंत कहां है ? वह अनन्त कौन और कैसा है ?। यह सब जानने की लालसा सदा सर्वदा रही है। इन विषयों की गम्भीरतम गवेषणाएं इस पवित्र भारत भूमि में हुई हैं,जो संहितावों के रूप में भी उपलब्ध हैं और गुरु,शिष्य परम्परानुसार भी उत्तरोत्तर चलीं हैं।


(....शेष अगली किश्त में )

 

 

क्या योग और संगीत के बीच संबंधों का कोई वैज्ञानिक आधार भी है ?

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